यह कैसा गम है यह कैसी खुशी है
न मैं दुःख पाती हूँ न मैं सुख पाती हूँ।
जब गम आता पास
प्रार्थना करता है ईश्वर से इंसान
न मैं प्रार्थना कर पाती हूँ
न गम सहन कर पाती हूँ।
यह कैसा .....
यह कैसा .....
जब यह बेला थी नहीं आयी
तब मैं नासमझ थी
अब न नासमझ हूँ,
न मैं समझदार हूँ||
यह कैसा.....
यह कैसा.....
बेला है ससुराल जाने की,
मैं ससुराल जा रही हूँ,
न मैं रो रही हूँ,
न मैं हँस रही हूँ||
यह कैसा.....
यह कैसा.....
प्रत्येक नारी ह्रदय ही है कुछ ऐसा,
जब तक सामंजस्य न कराले वैसा,
न पीहर छोड़ पाती है,
न ससुराल से जुड़ पाती है||
यह कैसा....
यह कैसा....
यह कैसा मिलन है,
यह कैसी जुदाई है|
इश्वर ने अजब - निराली
रीत यह बनाई है||
यह कैसा गम है, यह कैसी खुशी है||
न मैं दुःख पाती हूँ , न मैं खुश हो पाती हूँ।
न मैं दुःख पाती हूँ , न मैं खुश हो पाती हूँ।