Saturday, March 27, 2010

नारी- मन


यह कैसा गम है यह कैसी खुशी है
न मैं दुःख पाती हूँ न मैं सुख पाती हूँ।


जब गम आता पास 
प्रार्थना करता है ईश्वर से इंसान
न मैं प्रार्थना कर पाती हूँ
न गम सहन कर पाती हूँ।
यह कैसा .....

जब यह बेला थी नहीं आयी 
तब मैं नासमझ थी 
अब न नासमझ हूँ,
न मैं समझदार हूँ|| 
यह कैसा.....


बेला है ससुराल जाने की,
मैं ससुराल जा रही हूँ,
न मैं रो रही हूँ,
न मैं हँस रही हूँ|| 
यह कैसा.....

प्रत्येक नारी ह्रदय ही है कुछ ऐसा,
जब तक सामंजस्य न कराले वैसा,
न पीहर छोड़ पाती है,
न ससुराल से जुड़ पाती है|| 
यह कैसा....

यह कैसा मिलन है,
यह कैसी जुदाई है|
इश्वर ने अजब - निराली
रीत यह बनाई है||

यह कैसा गम है, यह कैसी खुशी है||
न मैं दुःख पाती हूँ , न मैं खुश हो पाती हूँ। 
- संध्या 'राज' मेहता