Tuesday, April 27, 2010

मोरे गुरुवर को बेटी उर्फ़ शिष्या की अरज भरी गुहार



- संध्या 'राज' मेहता
मीरा रोड 
D/O बाबुलालजी बोहरा





मोरे गुरुवर को बेटी उर्फ़ शिष्या की अरज भरी गुहार
गुरुवर मोरे मोहे क्यों बिसराई?
सोच सोच अँखियाँ भर आई|
बेटी होत है धन पराई ,
रीत यह जग ने ही बनाई|
महावीर ने जिन धर्म की ज्योत जलाई,
स्थानक-मंदिर प्रथा गुरुओं ने ही बनाई|
मन की लगन,धर्म की अगन, बुझत न बुझाई,
फिर काहे दोष मढ़त, काहे सजा सुनाई|
 शादी-ब्याह नहीं होत सिर्फ खेल- हंसाई,
जन्मों का बंधन है,बंध जाए प्रीत पराई|
तुम संग आस्था, श्रद्धा ,प्रीत बरसों से लगाईं,
बेटी पराई, स्थानकवासी कह पल में ठुकराई|
मात-पिता बिछोह,सुख-दुःख जहन संग लाई,
हर रिश्ते-नाते बहु-बेटी बन निभाई| 
नए संग जोड़ी,पुरानी भी न बिसराई| 
तुमरी सीख अब तक मन-मंदिर में सजाई,

लाज पीहर की रख अनजाने रिश्ते बाँध पाई|
बेटा-बेटी में फर्क नहीं ,क्यों सिर्फ गुहार लगाई?
क्यों स्थानकवासी बेटियां हुईं पराई?
तुमरे आशीष-वचन,दिव्य-दृष्टि क्यों संकुचाई? 
मोरे गुरुवर क्यों की मोहे पराई?
मात-पिता-गुरु सब ही को हम शीष चढ़ाई,
चाहें हम तुमरा आशीष,पलक -पावड़े बिछाई|
महेर करो गुरुवर,दरसन को अँखियाँ तरसाईं,
मुझ संग की जो तुमने,अनजानी दिल-दुखाई,
न कीजो शिष्याओं की श्रद्धा-भावना पराई|
गुरु राजेन्द्र-छबि बचपन से दिल में बसाई,
तुम संग श्रद्दा-आस्था की बीन बजाई,
चौबीस बरस पाल-पौस बेल विकसाई,
सब पंथों संग नाता है जिन-धर्माई,
पर कैसे बसाऊँ यहाँ दूजे को स्थाई|
गुरु तुमरे सुकाज से सदा मन हर्षाई,
तुमरी अस्वस्थता सुन नैनन नीर बहाई,
तुमसे अनजानी बेटियों की धर्म-सगाई,
कैसे टूटे? चाहे करले रस्मों की सगाई|
राजेन्द्र-जयंत-ज्योत बुझत न बुझाई|
महावीर संग गौतम ने प्रीत लगाई,
गौतम ने भी उनसे प्रश्नोत्तरी बनाई|
अब बेटियों के प्रश्नों की बौछार है आई,
गुरुवर मोरे दिल न दुखाओ,ख़त्म करो लड़ाई,
मोरे गुरुवर मोरे रहियो,न करियो मोहे पराई|
 न करियो मोहे पराई| 
- संध्या 'राज' मेहता
मीरा  रोड