Saturday, June 22, 2013

जयंतसेन सूरीश्वर न्यारे,विनती है चरण थारे।

सूरीश्वर न्यारे,विनती है चरण थारे।जत
*हर पल स्मरणीय गुरुदेव  के चरणों में अनगिनत वंदन के साथ सादर समर्पित*
चातक प्यासा वर्ष बिताता,
पुनः मिलन की आस में ,
मैं हर दिन गुरु स्मरण में बिताती ,
प्रत्यक्ष दर्शन की चाह में ।
विरह -व्यथा में व्याकुल नारी
कृष्ण दर्शन को आतुर गोपियाँ सारी
इस विध गुरु दर्शन की प्यासी अंखिया बेचारी,
हर पल सम्मुख रखे तोरी छवि मनोहारी।
तुम दर्शन की लगन लगी ऐसी भारी ,
अमन की अंखिया पल -पल दर्शन कर बलिहारी ,
शिष्या अर्ज करे विनती स्वीकारो गुरु म्हारी ,
मन-मंदिर से ओझल न कीजो सूरत थारी ।
संबल हो आप हमारे,प्रेरणा -पुंज पर वारी - वारी,
चिंतन -मनन की शक्ति आपसे मिलती न्यारी न्यारी ,
मोरे गुरुवर मोरे रहियो ,
मन-मंदिर  है थारी  क्यारी।
मन मंदिर में आप बिराजो
इतनी सी है विनती म्हारी ।
इतनी सी है विनती म्हारी ।।
डॉ. संध्या 'राज' मेहता
मीरारोड