Monday, October 5, 2020

अंगदान -महादान

  दानी करते देखो ,कितना दान ! 

धन ने दिया उन्हें यह वरदान।

तन है हमारे पास भी आओ बने महान,

अंगदान भी तो है, सब दानों में महादान।


ईश्वर ने दिया हमें, अनुपम उपहार,

हमें मिला अनमोल अंगों का भंडार।

तन मिला है हमें स्वस्थ सहज अपार , 

ईश्वर की कृपा हम पर अनन्त अपरम्पार।


जी भर जिया हमने, जीवन सदा मस्त,

पर अनेक जन हैं, जो सहते अथाह कष्ट।

हो जाएगा जब जीवन हमारा अस्त,

काया हो जाएगी हमारी ध्वस्त।


ईश्वर की रचना यह,सुंदर शरीर साकार,

व्यर्थ न जाए हम पर, उसका यह प्यार।

ईश्वर के रहेंगे, हम सदा कर्जदार, 

चुका न सकेंगे, कभी उसका यह उधार


मृत्यु के बाद भी ,अंग रहें हमारे जीवंत,

इच्छाशक्ति गर हमारी ,यह हो बलवंत।

त्वचा दान , नेत्र दान, हृदय दान,

कर सकें ,जिन अंगों का ,करें दान।


 ईश्वर की करुणा का करने प्रचार -प्रसार, 

आओ करें ,मरणोपरांत अपने अंगों का करार।

लेन-देन नहीं, नहीं है यह कोई व्यापार, 

अंगदान तो बस है,दाता दिल का,कई दिलों से प्यार।


इतना समझाने पर भी जब हमारा तन मन किसी की बात नहीं सुनता ,तब हमारी आत्मा धिक्कारते हुए कहती है--

 मुट्ठी बाँधे आया जगत में, 

हाथ पसारे जाएगा ,

शरीर मोह में क्यों फँसा है पगले,

ये तो यूँ भी जल जाएगा। 

ये तो यूँ भी गल जाएगा।


आत्मा हमें उलाहना देते हुए कहती है---

क्या करेगा प्यार तू ईमान को ,

क्या करेगा प्यार तो भगवान को।

साथ में रहकर भी जिसके, 

कर न पाया प्यार तू इंसान को।


पुनः आत्मा अमर होने का संदेश देती है---

जग में आया है तो,

कर ले कुछ ऐसे काम।

जिंदगी के बाद भी

जिंदा रहेगा सदा नाम।


 जीते जी रक्तदान,

मरणोपरांत अंगदान।

मानवता की यही पहचान

 यही मानव का सच्चा ईमान।

अंगदान - महादान, अंगदान - महादान।

- डॉ.संध्या 'राज' मेहता

   मीरारोड़