*सुहागिन विधवा*
डॉ. संध्या राज मेहता
मीरारोड़ ,मुंबई
काल बन कलुषित कोरोना आया,
चहूँ ओर गमगीन नाद सुनाया।
जीवन ज्योति जगमग जलती रहे,
एक ही स्वर अनेक संवादों से आया।
कपटी कोरोना से पीड़ित कमनसीब दम्पत्ति,
किस घड़ी में आई यह बला,कैसी यह विपत्ति?
ठहर ठहर सी गई उनकी खुशहाल जिंदगी ,
फिर भी टिकी रही विश्वास भरी उम्मीदगी।
अर्धांगिनी संग कोरोना ग्रसित दो जिस्म एक जान,
मिलन बेबस हो, कोरंटाईन, आई.सी.यू ने लिया ठान।
दर्शन की बेताबी,एक दूजे से दूरी कई दिनों की,
कपटी कोरोना की कयामत से, बनी दूरी जन्मों की।
पत्नी की ढलती हालत का गम पति को निगल गया,
पति वियोग अस्वस्थ अर्धांगिनी को बताया न गया।
ढलती साँसों से मौत संग लड़ती रही वह ,
पति की अस्वस्थता को पूछती रही वह।
पति वियोग सुनती तो विधवा हो जाती वह ,
बिन सुने तो खुद को सुहागन माने रही वह।
कोरोना की काली करतूत ने फिर करारा वार किया,
अधूरी साँसों ने भी अकेले चलना अस्वीकार किया।
क्रूर, कपटी कोरोना काल बन कयामत कर गया,
काला नाग कोरोना, देखते देखते दोनों को डस गया।
विधवा अपनी नजरों में सुहागिन सजी बैठी थी,
सुहागिन विदा करने की सबकी इच्छा जगी थी।
कपटी कोरोना ने इस मंशा पर भी घात लगाई,
बिन छूए, बिन सजे, सुहागन विधवा की हुई बिदाई।
भरे पूरे परिवार और माँ को बिलखता छोड़ गए,
क्यों चले गए? बच्चे पूछकर, बड़े सोचकर थक गए।
कोरोना की यह काली करतूत मुश्किल से सह गए,
बस अश्रु रह गए और दो जिस्म बह गए।