कंपनी की विगतवार जानकारी लेकर ही सही निष्कर्ष निकालें| अथवा
कंपनी की विगतवार जानकारी एवं उसके शब्दों का सही अर्थ समझकर ही निष्कर्ष निकालें|
कंपनी की विगतवार जानकारी एवं उसके शब्दों का सही अर्थ समझकर ही निष्कर्ष निकालें|
शेयर बाजार में निवेशक जिस कंपनी के शेयर में निवेश कर रहा है,उसकी सम्पूर्ण जानकारी अवश्य ले लेनी चाहिए| इस जानकारी हेतु उसे संशोधन अहेवाल(जानकारी) पढ़कर समझना जरूरी है| इस प्रकार का अहेवाल जाने-माने शेयर दलाल और इकोनोमिक टाइम्स जैसे समाचार पत्र प्रकट करते रहते हैं| वे कंपनी के प्लोट का दौरा कर मुलाक़ात करते हैं| कंपनी के कर्मचारियों के पास से जरूरी जानकारी प्राप्त करते हैं और कंपनी की
बेलेंसशीट वगैरह जांच-परख कर स्वयं की राय (अहेवाल) प्रकट करते हैं| इस प्रकार के अहेवाल समझना सरल होता है लेकिन फिर भी निवेशक को अहेवाल में उपयोग में आने वाले शब्दों का सही अर्थ समझना जरूरी है| पूरा अहेवाल पढ़कर निवेशक स्वयं सम्पूर्ण रूप से उसे समझे और उसका सही निष्कर्ष निकालकर खुद स्वतंत्र निर्णय ले,यह नितांत आवश्यक है|
अहेवाल में सामान्य रूप से प्रयोग होने वाले शब्द इस प्रकार हो सकते हैं- इक्विटी, प्रमोटर्स स्टेक, फेस वेल्यु(FV), बुक वेल्यु(BV), रिटर्न आन नेट वर्थ (RONW),एक्स बोनस (XB or Ex-Bonus),ऑपरेटिंग प्रोफिट मार्जिन(OPM),प्रोफिट आफ्टर टेक्स (PAT),प्रोफिट आफ्टर इंटरेस्ट
डेप्रिसिएशन एंड टेक्स (PBIDT),अर्निंग पर शेयर,प्राइस अर्निंग रेशियो ,इंडस्ट्री पी. इ.,इंडस्ट्री मार्केट केपिटलाइजेशन,ट्रेइलिंग ट्वेल्व मंथ्स,इयर एंड ,रिज़र्व कंसोलिडेटेड,स्टेंड एलोन, फाइनेन्सियल इयर एवं केलेंडर इयर आदि - इत्यादि |
कंपनी अपनी बेलेंस शीट में जो सामान्य शेयर केपिटल दिखाती है उसे इक्विटी कहते हैं| जितने शेयर जारी किए जाते हैं उन्हें इस्युड केपिटल
कहा जाता है| शेयर धारक जितने शेयर में पैसा रोकता है उसे सब्सक्राइब्ड
केपिटल कहा जाता है| यह केपटल भी पूर्णतः या अंशतः पेड अप हो सकती है|इक्विटी केपिटल में प्रमोटर के जितने शेयर होते हैं उन्हें प्रमोटर्स स्टॉक कहा जाता है|सामान्यतः यह आँकड़ा प्रतिशत में दर्शाया जाता है| कंपनी को जितनी रकम की केपिटल इश्यू करने की मंजूरी मिली है उसे ओथोराइस्ड केपिटल कहा जाता है|ओथोराइस्ड केपिटल का आँकड़ा बेलेंस शीट के हिसाब में गिनने में नहीं आता है|
मान लीजिए कि एक कंपनी को दस रुपिया का एक ऐसे एक लाख शेयर जारी करने की अनुमति है ,इस कंपनी की ओथोराइस्ड शेयर केपिटल दस लाख गिनी जाती है|(१०*१,००,०००)| अब यदि कंपनी केवल पचास हजारशेयर इश्यु करती है तो इस्युड केपिटल पांच लाख गिनी जाती है (१०*५,००,००)| ये पचास हजार शेये कंपनी प्रति शेयर तीस रूपए में देती है तो कंपनी के शेयर की फेस वेल्यु (FV) दस रूपए और बुक वेल्यु (BV) तीस रूपए गिनी जाती है| यदि सभी शेयर का कोटा पूर्णतः भरा जाता है तो कंपनी को कुल पंद्रह लाख रूपए मिलेंगे (३०*५०,०००)| कंपनी स्वयं की बेलेंस शीट में इस्युड,सब्सक्राइब्ड और पेड अप केपटल के रूप में पांच लाख रूपए ही बताएगी|(१०*५०,०००)|और बाकि के दस लाख रूपए कंपनी शेयर प्रीमियम खाता में बताएगी (२०*५०,०००)|ये खाता कंपनी का रिज़र्व फंड गिना जाता है|
इस प्रकार कंपनी को मिले हुए पंद्रह लाख रूपए में से पांच लाख रूपए इस्युड, सब्सक्राइब्ड और पेड अप केपिटल गिनी जाती है और बाकि के दस लाख रूपए कंपनी का रिज़र्व फंड गिना जाता है| यदि कंपनी के प्रमोटर्स ने स्वयं साडे सात लाख रूपए सब्सक्राइब्ड किए हों तो कंपनी में प्रमोटर्स स्टॉक ५० % गिना जाता है|कंपनी इक्विटी शेयर केपिटल के अलावा प्रिफरेंस शेयर केपिटल भी जारी कर सकती है|ऐसे शेयर को डिविडेंड के लिए प्रथम पसंदगी दी जाती है| यदि कंपनी को प्रोफिट होता है और वह डिविडेंड देती है तो सबसे पहले प्रिफरेंस शेयर को डिविडेंड मिलता है,उसके बाद जो प्रोफिट बचे उसमें से सामान्य शेयर (इक्विटी) को डिविडेंड दिया जाता है|जब कंपनी घाटे से बंद होती है तब सबसे पहले प्रिफरेंस शेयर केपिटल वापस की जाती है,उसके बाद जो बचे ,उसमें से इक्विटी शेयर धारकों को प्रमाणानुसार केपिटल चुकाई की जाती है|
सामान्यतः कंपनी स्वयं का हिसाब प्रतिवर्ष मार्च के अंत में बनाकर शेयर धारकों को भेजती है|अप्रैल से मार्च तक के वर्ष को फायनेंशियल इयर (FY) कहा जाता है|जबकि जेन्युअरी से डिसेम्बर तक के वर्ष को केलेंडर वर्ष (CY) कहा जाता है| आयकर विभाग के नियम के अनुसार प्रत्येक कंपनी को अपनी आय फैनेंसियल इयर (FY) के हिसाब से गिनकर टेक्स भरना जरूरी है|फिर चाहे कंपनी अपना हिसाबी वर्ष (Accounting year) केलेंडर वर्ष (CY) रखे|कंपनी के लिएअपने हिसाबी वर्ष के अनुसार हिसाब बनाकर और जाँच करके प्रत्येक शेयर धारक को भेजना जरूरी है|
सामान्यतः कंपनी स्वयं का हिसाब प्रतिवर्ष मार्च के अंत में बनाकर शेयर धारकों को भेजती है|अप्रैल से मार्च तक के वर्ष को फायनेंशियल इयर (FY) कहा जाता है|जबकि जेन्युअरी से डिसेम्बर तक के वर्ष को केलेंडर वर्ष (CY) कहा जाता है| आयकर विभाग के नियम के अनुसार प्रत्येक कंपनी को अपनी आय फैनेंसियल इयर (FY) के हिसाब से गिनकर टेक्स भरना जरूरी है|फिर चाहे कंपनी अपना हिसाबी वर्ष (Accounting year) केलेंडर वर्ष (CY) रखे|कंपनी के लिएअपने हिसाबी वर्ष के अनुसार हिसाब बनाकर और जाँच करके प्रत्येक शेयर धारक को भेजना जरूरी है|