Saturday, September 22, 2018

मामा घर का निमंत्रण , नारी मन का मंथन।

मामा घर का निमंत्रण ,
नारी मन का मंथन।

*आमंत्रण से आतुरता,
नारी मन की व्याकुलता,
 मिलन की प्रतिकूलता,
धीरज ही अनुकूलता।

अभी योग -संयोग नहीं,
 होगा नहीं आना,
सबके नसीब में नहीं,
 मामा घर जाना।

पुराने किस्से दोहराना।
मस्ती में मस्त होना।
बचपन फिर लौट आना।
बरसों बीते लौटा न वो जमाना।

काश कोई  टी.वी.,मोबाईल बिन
 गिल्ली  डंडे, गाडम गाड़ी,
छिपम छाई,नदी -पहाड़  वाले,
वो  दिन फिर से  लौटा दे।

ताश की बाजियों में वो
हंसना रूठना मनाना।
बरसों बीते लौटा न वो जमाना।
अब कहाँ नसीब
 वो मामा घर जाना।

राखी पर जाना ,
पर्युषण करके आना
पढ़ाई का चाहे हो हर्जाना।
तय था, अव्वल ही है आना।

माँ भी कितनी बेफिक्र थी
कहां पिता के खाने की चिंता
संयुक्त परिवार  था चलता  ,
सब कुछ अपने आप मिलता।

 घर वालों की छोड़ो
अब काम वालियां से
 काम कराने की भी है चिंता।
मामा घर की छोड़ो

 मायके  जाने नहीं मिलता।
ऐसा नहीं रोके कोई टोके कोई।
अपनो से मिलने हेतु मन बगावत करता
पुनः अपनो की चिंता में मन खुद ही बदलता।

जाने की जिद करता,
जाने की मन में ठाने  रखता।
एन वक्त पर सिरफिरा मन
जाने कैसे पलटी मार मुकरता।

इसी  का नाम नारी मन
यही सत्य नारी समर्पण।
प्रतिकूलता में भी पाती अनुकूलता
यही नारी की सहजता सरसता सरलता।


डॉ.संध्या 'राज' मेहता
मीरारोड़, मुम्बई

श्रद्धान्जली भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयीजी को

श्रद्धान्जली  भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयीजी को
महानायक ,संघ नायक ,देशभक्त,
राष्ट्र नायक, कवि ,उच्च कोटि के वक्ता,  दूरदृष्टि के धनी ,ओजस्वी विचारक,
महान क्रांतिकारी ,पथ प्रदर्शक ,अनगिनत सद्गुणों के स्वामी ,संततुल्य जीवन के धनी, अनुगामी
 व्यक्तित्व,  भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयीजी को कोटि कोटि नमन के संग श्रद्धान्जली आदरांजली।
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निश्चित ही हम अटलजी के सपनों का भारत बनाने का संकल्प लेते हैं। हम मानवता सहजता समरसता सरलता एवम निश्छलता आदि उनके सरस गुणों को अपने व्यक्तित्व में समावेश करने का दृढ़ संकल्प करते हैं।
ॐ शांति।
ईश्वर ऐसे देवतुल्य महापुरुषों को भारतभूमि पर पुनः अवतरित करते रहें। हम सदा उनकी छवि हमारे हृदय में रखकर  दर्पण की तरह रहेंऔर बाहर से ही नहीं अंदर से भी सदा एक से समरस सरस सरल प्रतिबिम्बित होते रहें। यही आरजू यही ईश्वर से प्रार्थना।
🙏

Wednesday, September 19, 2018

जयंतसेन सूरीश्वर न्यारे,विनती है चरणे थारे।

जयंतसेन सूरीश्वर न्यारे,विनती है चरणे थारे।
*हर पल स्मरणीय गुरुदेव  के चरणों मे अनगिनत वंदन के साथ सादर समर्पित*
चातक प्यासा वर्ष बिताता,
पुनः मिलन की आस में ,
मैं हर दिन गुरु स्मरण में बिताती ,
प्रत्यक्ष दर्शन की चाह में ।
विरह -व्यथा में व्याकुल नारी
कृष्ण दर्शन को आतुर गोपियाँ सारी
इस विध गुरु दर्शन की प्यासी अंखिया बेचारी,
हर पल सम्मुख रखे तोरी छवि मनोहारी।
तुम दर्शन की लगन लगी ऐसी भारी ,
अमन की अंखिया पल -पल दर्शन कर बलिहारी ,
शिष्या अर्ज करे विनती स्वीकारो गुरु म्हारी ,
मन-मंदिर से ओझल न कीजो सूरत थारी ।
संबल हो आप हमारे,प्रेरणा -पुंज पर वारी - वारी,
चिंतन -मनन की शक्ति आपसे मिलती न्यारी न्यारी ,
मोरे गुरुवर मोरे रहियो ,
मन-मंदिर  है थारी  क्यारी।
मन मंदिर में आप बिराजो
इतनी सी है विनती म्हारी ।
इतनी सी है विनती म्हारी ।।
डॉ. संध्या 'राज' मेहता
मीरारोड

मेरे गुरु -पुण्य सम्राट श्री जयंतसेनसूरीजी महारजसा.

                             
                                  
माननीय संपादक श्री लोढ़ा जी,     
सदर प्रणाम |
गुरुदेव के विशेषांक हेतु एक लेख भेज रही हूँ | कृपया प्रकाशित कर अनुग्रहीत करें | धन्यवाद |
डॉ. संध्या 'राज' मेहता 
मीरा रोड ,मुंबई 

 " जो भरा नहीं  भावों से,
बहती जिसमें रसधार नहीं ,
वह ह्रदय  नहीं पत्थर है ,
जिसे गुरु गुणों से प्यार नहीं ,
जिसे गुरुगुण अंगीकार नहीं | "

जिनेन्द्र भगवान ,आदि- अनादि महामंत्र नवकार  को कोटि- कोटि वंदन |
प्रातः स्मरणीय श्री राजेंद्र- यतीन्द्र- जयंत गुरुदेव को शत- शत नमन |पराम् पूज्य श्री नित्यसेन सूरीश्वरजी म.सा. एवं श्री जयरत्न सूरीश्वरजी म.सा. को वंदन | सभी श्रमण -श्रमणी परिवार को वंदन | सभी को जय -जिनेंद्र|  

    सहज सरस सरल गुरुदेव पुण्य सम्राट श्री जयंतसेनसुरिश्वरजी हम सब भक्तों के ह्रदय में साँस के साथ धड़कते हैं| अर्थात उन्हें भूलाना साँस लेना भूलने जैसा है |

गुरुदेव के गुणों का बखान करना, सूरज को दीपक दिखाने के समान है | गुरुदेव रूपी सूरज ने जो ज्ञान- ध्यान- अध्यात्म  का प्रकाश फैलाया, उसकी रोशनी सदा अक्षुण्ण रहेगी | 
अविरत लेखन,  लम्बे विहार , यादगार धर्म ध्यान-तपस्या -आराधना  पूर्ण चातुर्मास ,नवकार -आराधना , मंदिरों की प्रतिष्ठा ,जीर्णोद्धार ,संघ एकता ,जैन एकता , अखिल भारतीय राजेंद्र जैन नवयुवक परिषद् का विकास ,धार्मिक शिक्षण का प्रचार प्रसार,  जैन समाज की शैक्षणिक ,आर्थिक ,सांस्कृतिक , राजनीतिक प्रगति के प्रयास ,राष्ट्र - हित  का चिंतन एवं सबके बीच अनवरत अपनी अध्यात्म साधना , मौन साधना, आत्मिक उत्थान में  सदैव लीन गुरुदेव ने कभी विश्राम नहीं लिया | 

गुरुदेव ने अपने  सानिध्य में आये  प्रत्येक श्रमण ,श्रमणी , प्रत्येक  व्यक्ति , जैन  संघ, समाज ,गाँव, शहर ,देश , विदेश सभी को बहुत  कुछ दिया है ,उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था -

"इस देने में कुछ और नहीं ,
केवल समर्पण छलकता है ,
मैं  दे दूँ और न कुछ लूँ,
इतना ही सरस झलकता है |"

मेरे जीवन से जुड़े कुछ अविस्मरणीय वृतांत जो सदैव अभिन्न रहेंगे, आपसे रूबरू करना चाहती हूँ |
१. जयंत गुरुदेव -वचन सिद्ध गुरुदेव.
मेरी मम्मी निर्मला बोहरा  को डॉक्टरों ने हार्ट सर्जरी करवाने को कहा था| तीन नलियाँ ब्लॉक थीं | १५ वर्षों पूर्व गुरुदेव ने कहा था-" आपरेशन मत करवाओ ,जैसा है,वैसा चलने दो , जब तक मैं हूँ , कुछ नहीं होगा | चिंता मत करो और हकीकत में  १६ अप्रैल २०१७  के दिन शाम सात बजे मम्मी की चिर बिदाई के साथ- साथ  रात्रि साढ़े ११ बजे गुरुदेवश्री भी देवलोक प्रयाण कर गए | ऐसे थे हमारे वचनसिद्ध गुरुदेव,भक्तों के तारणहार  गुरुदेव। 


२.   " जिज्ञासुओं की जिज्ञासा का समाधान करते ,
         हर गौतम के लिए गुरुदेव महावीर बनते |"
     
बचपन से दादाजी श्री हूक्मीचन्जी और पिताश्री बाबुलालजी बोहरा, नागदा के साथ गुरुदर्शन और मोहनखेड़ा जाते रहे | २४ वर्ष की उम्र तक बालिका परिषद् से जुड़े रहे और कई जगह सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से नवकार महामंत्र और जैनत्व के प्रचार प्रसार  में हिस्सा लेते रहे | पिताश्री लगातार ६ वर्षों तक परिषद् के महामंत्री रहे| परिषद् के कार्यक्रमों की सूचना हेतु  पत्रों को टाइप करना पोस्ट में सहयोग ,इत्यादि से हम दोनों बहनें गुरुदेव की चहेती थीं | कई बार गुरुदेव से प्रत्यक्ष प्रश्नोत्तर करतीं और कई बार पोस्टकार्ड व अंतर्देशीय पत्र लिखकर प्रश्न पूछतीं | हमारे सहज सरल गुरुदेव हम दोनों बहनों को व्यस्तता के बावजूद यथासमय  पत्रोत्तर अवश्य देते | १९८६  में लिखा गुरुदेव का एक पोस्टकार्ड  प्रस्तुत है | जो भाई ब्रजेश बोहरा, राष्ट्रीय प्रचार मंत्री के पास आज भी है|





३. " भावुक गुरुदेव सबके मन की बात जानते ,
        हर संभव समाधान हो ,मन में ठानते | "

              मेरी शादी  के बाद  एक बार पिताश्री बाबूलालजी बोहरा को गुरुदेवश्री ने ऐसे ही कह दिया कि दोनों बेटियों का ब्याह स्थानक में हो गया, दोनों पराई हो गई | यह बात मेरे दिल को छू गई |  घर में  मंदिर -स्थानक दोनों में सामंजस्य कर रही थी || सामाजिक नियमों का निर्वहन भी अनिवार्य था | भावुकता और अज्ञानता वश मेरा कवि  ह्रदय अपने गुरुमुख से निकले 'पराई' शब्द को स्वीकार नहीं कर पाया और अपनी श्रद्धा और भक्ति के वशीभूत हो अश्रु बहाती रही | गुरु दर्शन का संयोग न होने पर मन के भाव कलम बद्ध  हो गए |

          कई बार गुरुदेव के दर्शन वंदन के लिए जाना चाहा, लेकिन कर्मबन्धन ऐसे कि  संयोग न बना |
 बड़नगर चातुर्मास के दौरान समधिप्रवर राजेन्द्रजी एवं सखी संगीताजी ने भी आग्रह किया|  रिजर्वेशन दो बार करवाया ,लेकिन शायद मेरी भक्ति पराकाष्ठा पर नहीं थी सो व्यवधान आते रहे और गुरु -दर्शन की प्यास अधूरी  रही |
"चातक प्यासा वर्ष बिताता,
 स्वाती बूँद की चाह में ,
 मैं  विरह  के पल बिताती ,
गुरु दर्शन की चाह में |"

   जिस प्रकार गोपियाँ कृष्ण दर्शन को व्याकुल रहती , उसी तरह हम बेटियाँ आतुर रहतीं | पलक पावड़े बिछाए इन्तजार करती ,गुरु दर्शन शीघ्र हो, मन ही मन आस रखतीं |  
कविता पढ़- पढ़ अश्रु बहाए, पर प्यास न बुझी , वरन बढ़ती गई | जहां चाह बलवती होती गई  वहां  राह भी खुल  गई | संयोगवश गुरुदेव सूरत पधारे और मैंने भी प्रण किया कि इस बार जब तक गुरुदेव के दर्शन को नहीं जाउंगी तब तक कहीं भी नहीं जाऊँगी  | बस गुरुदेव के आशीष और मेरे पुण्योदय से पतिदेव  राजेंद्र मेहता मुझे सपरिवार सूरत लेकर  गए | चरनी रोड में पतिदेव 'राज' का C, A   का ऑफिस  था, तब चर्नीरोड खेतवाड़ी गुरुमंदिर के आडिट से सम्बंधित चर्चा गुरुदेव से हुई  थी |  पिताश्री  के साथ मलाड में भक्तों के घर गुरुदेवश्री को  पगलिए  करते  देख  राज  आश्चर्य चकित हो गए थे | गुरुदेव की तेज गति , उनका भक्तों पर प्रभाव और  उनकी कार्यशैली देख वे भी गुरुभक्त हो गए थे |
सूरत में  बहन डॉ. बीना चौधरी  नीमच और मौसेरा भाई शशांक लुनावत भी साथ  थे | वंदन के पश्चात दोनों बहनो को एक साथ देख  अनायास पुनः गुरुदेवश्री के मुखकमल से  निकल गया -" तुम दोनों तो पराई हो गई |"  बस यह 'पराई'  शब्द सुनकर मेरी आँखें छलक पड़ीं | बरसों का बाँध टूट गया ,आंसू रुकने का नाम न ले रहे थे | सारे गुरु भक्त आश्चर्य चकित , गुरुदेवश्री भी भाव विभोर हो गए | सुनकर  कारण कि मैं  क्यों रो रही थी और गुरु दर्शन को कितनी व्याकुल थी |
बहन बीना  ने बताया, गुरुदेव संध्या ने कविता भी लिखी है\ गुरुदेव ने हमें रोका ,शाम को कविता पढ़ी, मेरे भाव समझ गए और वासक्षेप कर आशीष देकर विदा किया |

गुरुदेव की अनोखी कृपादृष्टि ---   

'पराई' शब्द को मेरे जहन  व दिलो दिमाग से निकालने हेतु शायद गुरुदेव कटिबद्ध थे | अतः  अस्वस्थता और व्यस्तता के बावजूद मीरारोड प्रतिष्ठा के समय  गीताजी जैन मेयर के घर जाने के पूर्व गुरुदेवश्री ने कहा- पहले 'छोरी' के घर जाना है|
 गुरुदेव के ये उदगार  हम बेटियों को 'पराई' शब्द से सदा के लिए मुक्त कर गए और हमारे  नवीन घर में अपनी चरण रज  देकर मुझे धन्य कर गए|  मौन रहकर आशीषों की झड़ी बरसा कर गुरुदेव मानो कह रहे थे  - माया- ममता -मोह और कर्मों के बंधन ने तुझे मुझसे  दूर रखा, आज सारे बंधन टूट गए| पिताश्री बाबुलालजी को देख गुरुदेव  की  दृष्टि  भी मानो यही उदगार दे रही थी -

"बेटियाँ  तो बेटियां होती हैं ,
बेटियां कभी पराई नहीं होती ,
 घर- परिवार, संघ- समाज की जान होती है ,
दो कूलों  को दीपाने वाली   बेटियाँ  तो
 देश की आन - बान -शान होती है | "

जिस प्रकार महावीर गौतम को बिना कहे निर्वाण प्राप्त हुए और गौतम ने विलाप किया, उसी तरह मेरा  कवि ह्रदय  कविताबद्ध हो गया | यह गुरु के प्रति अनन्य भक्तिभाव ,समर्पण भाव है जो गुरु से एक प्रश्न के रूप में उभरा था और मेरे भोले ,सामर्थ्यवान गुरुदेव ने समाधान किया |

न केवल मंदिरवासी  ,स्थानकवासी ,तेरा पंथी, दिगम्बर ,सभी जैन और अजैन यानि हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सभी इनके भक्त हैं |  यहां तक कि  विदेशों  में भी  इन राष्ट्र संत  के भक्त हैं | राष्ट्र्रीय एकता का संदेश गुरुदेव  जन -जन  के तन- मन  में  भर गए |  गुरुदेवश्री के दर्शन की व्याकुलता में लिखी , गुरुदेव को भाव विभोर करने वाली कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत है। ....

- संध्या 'राज' मेहता
मीरा रोड 
D/O बाबुलालजी बोहरा 





मोरे गुरुवर को बेटी उर्फ़ शिष्या की अरज भरी गुहार
गुरुवर मोरे मोहे क्यों बिसराई?
सोच सोच अँखियाँ भर आई|
बेटी होत है धन पराई ,
रीत यह जग ने ही बनाई|
महावीर ने जिन धर्म की ज्योत जलाई,
स्थानक-मंदिर प्रथा गुरुओं ने ही बनाई|
मन की लगन,धर्म की अगन, बुझत न बुझाई,
फिर काहे दोष मढ़त, काहे सजा सुनाई|
 शादी-ब्याह नहीं होत सिर्फ खेल- हंसाई,
जन्मों का बंधन है,बंध जाए प्रीत पराई|
तुम संग आस्था, श्रद्धा ,प्रीत बरसों से लगाईं,
बेटी पराई, स्थानकवासी कह पल में ठुकराई|
मात-पिता बिछोह,सुख-दुःख जहन संग लाई,
हर रिश्ते-नाते बहु-बेटी बन निभाई| 
नए संग जोड़ी,पुरानी भी न बिसराई| 
तुमरी सीख अब तक मन-मंदिर में सजाई,

लाज पीहर की रख अनजाने रिश्ते बाँध पाई|
बेटा-बेटी में फर्क नहीं ,क्यों सिर्फ गुहार लगाई?
क्यों स्थानकवासी बेटियां हुईं पराई?
तुमरे आशीष-वचन,दिव्य-दृष्टि क्यों संकुचाई? 
मोरे गुरुवर क्यों की मोहे पराई?
मात-पिता-गुरु सब ही को हम शीष चढ़ाई,
चाहें हम तुमरा आशीष,पलक -पावड़े बिछाई|
महेर करो गुरुवर,दरसन को अँखियाँ तरसाईं,
मुझ संग की जो तुमने,अनजानी दिल-दुखाई,
न कीजो शिष्याओं की श्रद्धा-भावना पराई|
गुरु राजेन्द्र-छबि बचपन से दिल में बसाई,
तुम संग श्रद्दा-आस्था की बीन बजाई,
चौबीस बरस पाल-पौस बेल विकसाई,
सब पंथों संग नाता है जिन-धर्माई,
पर कैसे बसाऊँ यहाँ दूजे को स्थाई|
गुरु तुमरे सुकाज से सदा मन हर्षाई,
तुमरी अस्वस्थता सुन नैनन नीर बहाई,
तुमसे अनजानी बेटियों की धर्म-सगाई,
कैसे टूटे? चाहे करले रस्मों की सगाई|
राजेन्द्र-जयंत-ज्योत बुझत न बुझाई ,
महावीर संग गौतम ने प्रीत लगाई,
गौतम ने भी उनसे प्रश्नोत्तरी बनाई|
अब बेटियों के प्रश्नों की बौछार है आई,
गुरुवर मोरे दिल न दुखाओ,मत कहो पराई,  
मोरे गुरुवर मोरे रहियो,न करियो मोहे पराई|
 न करियो मोहे पराई|  
- संध्या 'राज' मेहता
मीरा  रोड 


नारी शक्ति

नारी शक्ति

                     -  डॉ.संध्या'राज'मेहता

नारी तुम शक्ति ,शौर्य ,साहस,
त्याग की मूरत प्यारी हो।
तुम्हीं लक्ष्मी ,सरस्वती, सीता,सावित्री,
तुम्हीं काली कलकत्ते वाली हो।
पुत्री,बहन ,पत्नी,माता हो या सखा,
हर रूप में तुम निराली हो।
तुमसे ही घर स्वर्ग है,
तुम इस स्वर्ग की चार दीवारी हो।
तुम हो तो हर दिन दीवाली है,
वर्ना दीवाली भी केवल अमावस काली है।
           डॉ.संध्या'राज'मेहता 
            मीरा रोड
            9029208468