मामा घर का निमंत्रण ,
नारी मन का मंथन।
*आमंत्रण से आतुरता,
नारी मन की व्याकुलता,
मिलन की प्रतिकूलता,
धीरज ही अनुकूलता।
अभी योग -संयोग नहीं,
होगा नहीं आना,
सबके नसीब में नहीं,
मामा घर जाना।
पुराने किस्से दोहराना।
मस्ती में मस्त होना।
बचपन फिर लौट आना।
बरसों बीते लौटा न वो जमाना।
काश कोई टी.वी.,मोबाईल बिन
गिल्ली डंडे, गाडम गाड़ी,
छिपम छाई,नदी -पहाड़ वाले,
वो दिन फिर से लौटा दे।
ताश की बाजियों में वो
हंसना रूठना मनाना।
बरसों बीते लौटा न वो जमाना।
अब कहाँ नसीब
वो मामा घर जाना।
राखी पर जाना ,
पर्युषण करके आना
पढ़ाई का चाहे हो हर्जाना।
तय था, अव्वल ही है आना।
माँ भी कितनी बेफिक्र थी
कहां पिता के खाने की चिंता
संयुक्त परिवार था चलता ,
सब कुछ अपने आप मिलता।
घर वालों की छोड़ो
अब काम वालियां से
काम कराने की भी है चिंता।
मामा घर की छोड़ो
मायके जाने नहीं मिलता।
ऐसा नहीं रोके कोई टोके कोई।
अपनो से मिलने हेतु मन बगावत करता
पुनः अपनो की चिंता में मन खुद ही बदलता।
जाने की जिद करता,
जाने की मन में ठाने रखता।
एन वक्त पर सिरफिरा मन
जाने कैसे पलटी मार मुकरता।
इसी का नाम नारी मन
यही सत्य नारी समर्पण।
प्रतिकूलता में भी पाती अनुकूलता
यही नारी की सहजता सरसता सरलता।
डॉ.संध्या 'राज' मेहता
मीरारोड़, मुम्बई
नारी मन का मंथन।
*आमंत्रण से आतुरता,
नारी मन की व्याकुलता,
मिलन की प्रतिकूलता,
धीरज ही अनुकूलता।
अभी योग -संयोग नहीं,
होगा नहीं आना,
सबके नसीब में नहीं,
मामा घर जाना।
पुराने किस्से दोहराना।
मस्ती में मस्त होना।
बचपन फिर लौट आना।
बरसों बीते लौटा न वो जमाना।
काश कोई टी.वी.,मोबाईल बिन
गिल्ली डंडे, गाडम गाड़ी,
छिपम छाई,नदी -पहाड़ वाले,
वो दिन फिर से लौटा दे।
ताश की बाजियों में वो
हंसना रूठना मनाना।
बरसों बीते लौटा न वो जमाना।
अब कहाँ नसीब
वो मामा घर जाना।
राखी पर जाना ,
पर्युषण करके आना
पढ़ाई का चाहे हो हर्जाना।
तय था, अव्वल ही है आना।
माँ भी कितनी बेफिक्र थी
कहां पिता के खाने की चिंता
संयुक्त परिवार था चलता ,
सब कुछ अपने आप मिलता।
घर वालों की छोड़ो
अब काम वालियां से
काम कराने की भी है चिंता।
मामा घर की छोड़ो
मायके जाने नहीं मिलता।
ऐसा नहीं रोके कोई टोके कोई।
अपनो से मिलने हेतु मन बगावत करता
पुनः अपनो की चिंता में मन खुद ही बदलता।
जाने की जिद करता,
जाने की मन में ठाने रखता।
एन वक्त पर सिरफिरा मन
जाने कैसे पलटी मार मुकरता।
इसी का नाम नारी मन
यही सत्य नारी समर्पण।
प्रतिकूलता में भी पाती अनुकूलता
यही नारी की सहजता सरसता सरलता।
डॉ.संध्या 'राज' मेहता
मीरारोड़, मुम्बई
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