माननीय संपादक श्री लोढ़ा जी,
सदर प्रणाम |
गुरुदेव के विशेषांक हेतु एक लेख भेज रही हूँ | कृपया प्रकाशित कर अनुग्रहीत करें | धन्यवाद |
सदर प्रणाम |
गुरुदेव के विशेषांक हेतु एक लेख भेज रही हूँ | कृपया प्रकाशित कर अनुग्रहीत करें | धन्यवाद |
डॉ. संध्या 'राज' मेहता
मीरा रोड ,मुंबई
" जो भरा नहीं भावों से,
बहती जिसमें रसधार नहीं ,
वह ह्रदय नहीं पत्थर है ,
जिसे गुरु गुणों से प्यार नहीं ,
जिसे गुरुगुण अंगीकार नहीं | "
जिनेन्द्र भगवान ,आदि- अनादि महामंत्र नवकार को कोटि- कोटि वंदन |
प्रातः स्मरणीय श्री राजेंद्र- यतीन्द्र- जयंत गुरुदेव को शत- शत नमन |पराम् पूज्य श्री नित्यसेन सूरीश्वरजी म.सा. एवं श्री जयरत्न सूरीश्वरजी म.सा. को वंदन | सभी श्रमण -श्रमणी परिवार को वंदन | सभी को जय -जिनेंद्र|
सहज सरस सरल गुरुदेव पुण्य सम्राट श्री जयंतसेनसुरिश्वरजी हम सब भक्तों के ह्रदय में साँस के साथ धड़कते हैं| अर्थात उन्हें भूलाना साँस लेना भूलने जैसा है |
गुरुदेव के गुणों का बखान करना, सूरज को दीपक दिखाने के समान है | गुरुदेव रूपी सूरज ने जो ज्ञान- ध्यान- अध्यात्म का प्रकाश फैलाया, उसकी रोशनी सदा अक्षुण्ण रहेगी |
अविरत लेखन, लम्बे विहार , यादगार धर्म ध्यान-तपस्या -आराधना पूर्ण चातुर्मास ,नवकार -आराधना , मंदिरों की प्रतिष्ठा ,जीर्णोद्धार ,संघ एकता ,जैन एकता , अखिल भारतीय राजेंद्र जैन नवयुवक परिषद् का विकास ,धार्मिक शिक्षण का प्रचार प्रसार, जैन समाज की शैक्षणिक ,आर्थिक ,सांस्कृतिक , राजनीतिक प्रगति के प्रयास ,राष्ट्र - हित का चिंतन एवं सबके बीच अनवरत अपनी अध्यात्म साधना , मौन साधना, आत्मिक उत्थान में सदैव लीन गुरुदेव ने कभी विश्राम नहीं लिया |
गुरुदेव ने अपने सानिध्य में आये प्रत्येक श्रमण ,श्रमणी , प्रत्येक व्यक्ति , जैन संघ, समाज ,गाँव, शहर ,देश , विदेश सभी को बहुत कुछ दिया है ,उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था -
"इस देने में कुछ और नहीं ,
केवल समर्पण छलकता है ,
मैं दे दूँ और न कुछ लूँ,
इतना ही सरस झलकता है |"
मेरे जीवन से जुड़े कुछ अविस्मरणीय वृतांत जो सदैव अभिन्न रहेंगे, आपसे रूबरू करना चाहती हूँ |
१. जयंत गुरुदेव -वचन सिद्ध गुरुदेव.
मेरी मम्मी निर्मला बोहरा को डॉक्टरों ने हार्ट सर्जरी करवाने को कहा था| तीन नलियाँ ब्लॉक थीं | १५ वर्षों पूर्व गुरुदेव ने कहा था-" आपरेशन मत करवाओ ,जैसा है,वैसा चलने दो , जब तक मैं हूँ , कुछ नहीं होगा | चिंता मत करो और हकीकत में १६ अप्रैल २०१७ के दिन शाम सात बजे मम्मी की चिर बिदाई के साथ- साथ रात्रि साढ़े ११ बजे गुरुदेवश्री भी देवलोक प्रयाण कर गए | ऐसे थे हमारे वचनसिद्ध गुरुदेव,भक्तों के तारणहार गुरुदेव।
२. " जिज्ञासुओं की जिज्ञासा का समाधान करते ,
हर गौतम के लिए गुरुदेव महावीर बनते |"
बचपन से दादाजी श्री हूक्मीचन्जी और पिताश्री बाबुलालजी बोहरा, नागदा के साथ गुरुदर्शन और मोहनखेड़ा जाते रहे | २४ वर्ष की उम्र तक बालिका परिषद् से जुड़े रहे और कई जगह सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से नवकार महामंत्र और जैनत्व के प्रचार प्रसार में हिस्सा लेते रहे | पिताश्री लगातार ६ वर्षों तक परिषद् के महामंत्री रहे| परिषद् के कार्यक्रमों की सूचना हेतु पत्रों को टाइप करना पोस्ट में सहयोग ,इत्यादि से हम दोनों बहनें गुरुदेव की चहेती थीं | कई बार गुरुदेव से प्रत्यक्ष प्रश्नोत्तर करतीं और कई बार पोस्टकार्ड व अंतर्देशीय पत्र लिखकर प्रश्न पूछतीं | हमारे सहज सरल गुरुदेव हम दोनों बहनों को व्यस्तता के बावजूद यथासमय पत्रोत्तर अवश्य देते | १९८६ में लिखा गुरुदेव का एक पोस्टकार्ड प्रस्तुत है | जो भाई ब्रजेश बोहरा, राष्ट्रीय प्रचार मंत्री के पास आज भी है|
३. " भावुक गुरुदेव सबके मन की बात जानते ,
हर संभव समाधान हो ,मन में ठानते | "
मेरी शादी के बाद एक बार पिताश्री बाबूलालजी बोहरा को गुरुदेवश्री ने ऐसे ही कह दिया कि दोनों बेटियों का ब्याह स्थानक में हो गया, दोनों पराई हो गई | यह बात मेरे दिल को छू गई | घर में मंदिर -स्थानक दोनों में सामंजस्य कर रही थी || सामाजिक नियमों का निर्वहन भी अनिवार्य था | भावुकता और अज्ञानता वश मेरा कवि ह्रदय अपने गुरुमुख से निकले 'पराई' शब्द को स्वीकार नहीं कर पाया और अपनी श्रद्धा और भक्ति के वशीभूत हो अश्रु बहाती रही | गुरु दर्शन का संयोग न होने पर मन के भाव कलम बद्ध हो गए |
कई बार गुरुदेव के दर्शन वंदन के लिए जाना चाहा, लेकिन कर्मबन्धन ऐसे कि संयोग न बना |
बड़नगर चातुर्मास के दौरान समधिप्रवर राजेन्द्रजी एवं सखी संगीताजी ने भी आग्रह किया| रिजर्वेशन दो बार करवाया ,लेकिन शायद मेरी भक्ति पराकाष्ठा पर नहीं थी सो व्यवधान आते रहे और गुरु -दर्शन की प्यास अधूरी रही |
"चातक प्यासा वर्ष बिताता,
स्वाती बूँद की चाह में ,
मैं विरह के पल बिताती ,
गुरु दर्शन की चाह में |"
जिस प्रकार गोपियाँ कृष्ण दर्शन को व्याकुल रहती , उसी तरह हम बेटियाँ आतुर रहतीं | पलक पावड़े बिछाए इन्तजार करती ,गुरु दर्शन शीघ्र हो, मन ही मन आस रखतीं |
कविता पढ़- पढ़ अश्रु बहाए, पर प्यास न बुझी , वरन बढ़ती गई | जहां चाह बलवती होती गई वहां राह भी खुल गई | संयोगवश गुरुदेव सूरत पधारे और मैंने भी प्रण किया कि इस बार जब तक गुरुदेव के दर्शन को नहीं जाउंगी तब तक कहीं भी नहीं जाऊँगी | बस गुरुदेव के आशीष और मेरे पुण्योदय से पतिदेव राजेंद्र मेहता मुझे सपरिवार सूरत लेकर गए | चरनी रोड में पतिदेव 'राज' का C, A का ऑफिस था, तब चर्नीरोड खेतवाड़ी गुरुमंदिर के आडिट से सम्बंधित चर्चा गुरुदेव से हुई थी | पिताश्री के साथ मलाड में भक्तों के घर गुरुदेवश्री को पगलिए करते देख राज आश्चर्य चकित हो गए थे | गुरुदेव की तेज गति , उनका भक्तों पर प्रभाव और उनकी कार्यशैली देख वे भी गुरुभक्त हो गए थे |
सूरत में बहन डॉ. बीना चौधरी नीमच और मौसेरा भाई शशांक लुनावत भी साथ थे | वंदन के पश्चात दोनों बहनो को एक साथ देख अनायास पुनः गुरुदेवश्री के मुखकमल से निकल गया -" तुम दोनों तो पराई हो गई |" बस यह 'पराई' शब्द सुनकर मेरी आँखें छलक पड़ीं | बरसों का बाँध टूट गया ,आंसू रुकने का नाम न ले रहे थे | सारे गुरु भक्त आश्चर्य चकित , गुरुदेवश्री भी भाव विभोर हो गए | सुनकर कारण कि मैं क्यों रो रही थी और गुरु दर्शन को कितनी व्याकुल थी |
बहन बीना ने बताया, गुरुदेव संध्या ने कविता भी लिखी है\ गुरुदेव ने हमें रोका ,शाम को कविता पढ़ी, मेरे भाव समझ गए और वासक्षेप कर आशीष देकर विदा किया |
गुरुदेव की अनोखी कृपादृष्टि ---
'पराई' शब्द को मेरे जहन व दिलो दिमाग से निकालने हेतु शायद गुरुदेव कटिबद्ध थे | अतः अस्वस्थता और व्यस्तता के बावजूद मीरारोड प्रतिष्ठा के समय गीताजी जैन मेयर के घर जाने के पूर्व गुरुदेवश्री ने कहा- पहले 'छोरी' के घर जाना है|
गुरुदेव के ये उदगार हम बेटियों को 'पराई' शब्द से सदा के लिए मुक्त कर गए और हमारे नवीन घर में अपनी चरण रज देकर मुझे धन्य कर गए| मौन रहकर आशीषों की झड़ी बरसा कर गुरुदेव मानो कह रहे थे - माया- ममता -मोह और कर्मों के बंधन ने तुझे मुझसे दूर रखा, आज सारे बंधन टूट गए| पिताश्री बाबुलालजी को देख गुरुदेव की दृष्टि भी मानो यही उदगार दे रही थी -
"बेटियाँ तो बेटियां होती हैं ,
बेटियां कभी पराई नहीं होती ,
घर- परिवार, संघ- समाज की जान होती है ,
दो कूलों को दीपाने वाली बेटियाँ तो
देश की आन - बान -शान होती है | "
जिस प्रकार महावीर गौतम को बिना कहे निर्वाण प्राप्त हुए और गौतम ने विलाप किया, उसी तरह मेरा कवि ह्रदय कविताबद्ध हो गया | यह गुरु के प्रति अनन्य भक्तिभाव ,समर्पण भाव है जो गुरु से एक प्रश्न के रूप में उभरा था और मेरे भोले ,सामर्थ्यवान गुरुदेव ने समाधान किया |
न केवल मंदिरवासी ,स्थानकवासी ,तेरा पंथी, दिगम्बर ,सभी जैन और अजैन यानि हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सभी इनके भक्त हैं | यहां तक कि विदेशों में भी इन राष्ट्र संत के भक्त हैं | राष्ट्र्रीय एकता का संदेश गुरुदेव जन -जन के तन- मन में भर गए | गुरुदेवश्री के दर्शन की व्याकुलता में लिखी , गुरुदेव को भाव विभोर करने वाली कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत है। ....
गुरुवर मोरे मोहे क्यों बिसराई?
सोच सोच अँखियाँ भर आई|
बेटी होत है धन पराई ,
रीत यह जग ने ही बनाई|
महावीर ने जिन धर्म की ज्योत जलाई,
स्थानक-मंदिर प्रथा गुरुओं ने ही बनाई|
मन की लगन,धर्म की अगन, बुझत न बुझाई,
फिर काहे दोष मढ़त, काहे सजा सुनाई|
शादी-ब्याह नहीं होत सिर्फ खेल- हंसाई,
जन्मों का बंधन है,बंध जाए प्रीत पराई|
तुम संग आस्था, श्रद्धा ,प्रीत बरसों से लगाईं,
बेटी पराई, स्थानकवासी कह पल में ठुकराई|
मात-पिता बिछोह,सुख-दुःख जहन संग लाई,
हर रिश्ते-नाते बहु-बेटी बन निभाई|
नए संग जोड़ी,पुरानी भी न बिसराई|
तुमरी सीख अब तक मन-मंदिर में सजाई,
लाज पीहर की रख अनजाने रिश्ते बाँध पाई|
बेटा-बेटी में फर्क नहीं ,क्यों सिर्फ गुहार लगाई?
क्यों स्थानकवासी बेटियां हुईं पराई?
तुमरे आशीष-वचन,दिव्य-दृष्टि क्यों संकुचाई?
मोरे गुरुवर क्यों की मोहे पराई?
मात-पिता-गुरु सब ही को हम शीष चढ़ाई,
चाहें हम तुमरा आशीष,पलक -पावड़े बिछाई|
महेर करो गुरुवर,दरसन को अँखियाँ तरसाईं,
मुझ संग की जो तुमने,अनजानी दिल-दुखाई,
न कीजो शिष्याओं की श्रद्धा-भावना पराई|
गुरु राजेन्द्र-छबि बचपन से दिल में बसाई,
तुम संग श्रद्दा-आस्था की बीन बजाई,
चौबीस बरस पाल-पौस बेल विकसाई,
सब पंथों संग नाता है जिन-धर्माई,
पर कैसे बसाऊँ यहाँ दूजे को स्थाई|
गुरु तुमरे सुकाज से सदा मन हर्षाई,
तुमरी अस्वस्थता सुन नैनन नीर बहाई,
तुमसे अनजानी बेटियों की धर्म-सगाई,
कैसे टूटे? चाहे करले रस्मों की सगाई|
राजेन्द्र-जयंत-ज्योत बुझत न बुझाई ,
महावीर संग गौतम ने प्रीत लगाई,
गौतम ने भी उनसे प्रश्नोत्तरी बनाई|
अब बेटियों के प्रश्नों की बौछार है आई,
गुरुवर मोरे दिल न दुखाओ,मत कहो पराई,
मोरे गुरुवर मोरे रहियो,न करियो मोहे पराई|
न करियो मोहे पराई|
मात-पिता बिछोह,सुख-दुःख जहन संग लाई,
हर रिश्ते-नाते बहु-बेटी बन निभाई|
नए संग जोड़ी,पुरानी भी न बिसराई|
तुमरी सीख अब तक मन-मंदिर में सजाई,
लाज पीहर की रख अनजाने रिश्ते बाँध पाई|
बेटा-बेटी में फर्क नहीं ,क्यों सिर्फ गुहार लगाई?
क्यों स्थानकवासी बेटियां हुईं पराई?
तुमरे आशीष-वचन,दिव्य-दृष्टि क्यों संकुचाई?
मोरे गुरुवर क्यों की मोहे पराई?
मात-पिता-गुरु सब ही को हम शीष चढ़ाई,
चाहें हम तुमरा आशीष,पलक -पावड़े बिछाई|
महेर करो गुरुवर,दरसन को अँखियाँ तरसाईं,
मुझ संग की जो तुमने,अनजानी दिल-दुखाई,
न कीजो शिष्याओं की श्रद्धा-भावना पराई|
गुरु राजेन्द्र-छबि बचपन से दिल में बसाई,
तुम संग श्रद्दा-आस्था की बीन बजाई,
चौबीस बरस पाल-पौस बेल विकसाई,
सब पंथों संग नाता है जिन-धर्माई,
पर कैसे बसाऊँ यहाँ दूजे को स्थाई|
गुरु तुमरे सुकाज से सदा मन हर्षाई,
तुमरी अस्वस्थता सुन नैनन नीर बहाई,
तुमसे अनजानी बेटियों की धर्म-सगाई,
कैसे टूटे? चाहे करले रस्मों की सगाई|
राजेन्द्र-जयंत-ज्योत बुझत न बुझाई ,
महावीर संग गौतम ने प्रीत लगाई,
गौतम ने भी उनसे प्रश्नोत्तरी बनाई|
अब बेटियों के प्रश्नों की बौछार है आई,
गुरुवर मोरे दिल न दुखाओ,मत कहो पराई,
मोरे गुरुवर मोरे रहियो,न करियो मोहे पराई|
न करियो मोहे पराई|
- संध्या 'राज' मेहता
मीरा रोड
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