आरजू
- संध्या 'राज' मेहता
हमने भी कभी चाहा है,
कोई मेरे सिरहाने बैठे,
मेरे बालों को सहलाए,
उनमें उँगलियाँ घुमाए,
बरसों की प्यास बुझ जाए,
इतना दुलार करे|
हमने भी कभी चाहा है,
कोई मेरी गलतियों को माफ़ करे,
मुझे भी सिर चढ़ाए,
मुझे सपने दिखलाए,
मेरी छोटी ख्वाहिशें पूरी करे,
मुझे बस प्यार ही प्यार करे|
हमने भी कभी चाहा है,
कोई मुझे रूठने पर मनाए,
मेरे साथ खिलखिलाए,
मेरे दर्द सहलाए,
उनका मजाक न बनाए,
मेरी और बस मेरी ही परवाह करे|
हमने भी कभी चाहा है,
प्यार की मीठी तान बजती जाए,
हम-तुम उसमें गोते लागाएँ,
तुम तुम न रहो, हम हम न रहें,
एक दूजे से हम दूर न रहें,
हमारा प्यारा साथ यों ही बरकरार रहे।
"हमने तो बस इतना ही चाहा है|"
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