Sunday, February 21, 2010

चंद-शेर

इस जग की बात बड़ी अजब व निराली है।
हर मोड़ पर तड़पाती है यूं ही तरसाती है।
जमाने के संग चलने को खुद को बदलती रही।
सम्पूर्ण बदलाव पर भी, वही पुरानी अपनी कहानी है|| (इस जग...)

दुनिया के हाल पर रोती हूँ, दुनिया मुझे रुलाती है|
जिन्हें चाहती हूँ, ये गम उन्हीं की निशानी है|| (इस जग...)

सोच-समझ के बिना इंसान पागल बन जाता है|
इन सोचों ने ही दी, हमें ये परेशानी है|| (इस जग...)

हमारे शब्द सभी को ज़हर से लगते है|
यह ज़हर तुम्हारे ही विषबाणों का तो प्रहरी है|| (इस जग...)

दूसरों से बनाने में, अपने तन-मन से बिगाड़ी है|
इसीलिए अँगडाई लेकर फिर नई दुनिया सँवारी है|| (इस जग...)

 

3 comments:

  1. Very Good Poem .... I was helpful for my speech ....

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  2. thanks.please write your name and contact no. or e.id.

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  3. If you wants help from me for poem in hindi on any subject,visit,write comments.
    I will try to give more &more to my students and lovely children.bye,have a nice year.

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