इस जग की बात बड़ी अजब व निराली है।
हर मोड़ पर तड़पाती है यूं ही तरसाती है।
जमाने के संग चलने को खुद को बदलती रही।
सम्पूर्ण बदलाव पर भी, वही पुरानी अपनी कहानी है|| (इस जग...)
दुनिया के हाल पर रोती हूँ, दुनिया मुझे रुलाती है|
जिन्हें चाहती हूँ, ये गम उन्हीं की निशानी है|| (इस जग...)
सोच-समझ के बिना इंसान पागल बन जाता है|
इन सोचों ने ही दी, हमें ये परेशानी है|| (इस जग...)
हमारे शब्द सभी को ज़हर से लगते है|
यह ज़हर तुम्हारे ही विषबाणों का तो प्रहरी है|| (इस जग...)
दूसरों से बनाने में, अपने तन-मन से बिगाड़ी है|
इसीलिए अँगडाई लेकर फिर नई दुनिया सँवारी है|| (इस जग...)
Very Good Poem .... I was helpful for my speech ....
ReplyDeletethanks.please write your name and contact no. or e.id.
ReplyDeleteIf you wants help from me for poem in hindi on any subject,visit,write comments.
ReplyDeleteI will try to give more &more to my students and lovely children.bye,have a nice year.