Monday, April 27, 2020

मुक्तक


माना रात घनी अँधेरी है
सपनों की अब बारी है ।

सपने देखना जरूरी है ,
बिन सपने जिंदगी अधूरी है ।
अँधेरी रात है, पर कुछ बात है,
देती नव  सपनों की सौगात है।

दिन के उजाले में सपने पूरा करना,
चाहे जो अंजाम हो  डटे रहना।
कर्मशील हो,अब कुछ करना,
वरना सदा पछताते रहना।

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भरी महफिल में वो  तन्हा तन्हा रहते हैं,
कोई कुछ कह न दे इसलिए डरते हैं ।
लोगों का क्या कुछ भी कह देते हैं ,
पर वो जीते जी, जीने की तमन्ना छोड़ देते हैं।

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जिंदगी की धूप छाँव से ,
इस कदर वास्ता रहा हमारा।
धूप सदा लगाती डेरा,
छाँव ने जब भी किया बसेरा
मना लिया फिर छाँव को
धूप ने नित नव आँचल पसारा।
सुख - दु:ख मन के मीत हैं,
 इनमें रमना ही जीवन - सहारा।


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दिल चाहे टूटा हो ,
सब पर गुस्सा छोड़ो
दिल  को सबसे जोड़ो।
अपने तो अपने हैं
उनसे माफी दो- लो।
पहले खुद को देखो
फिर दूसरों को तोलो।

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एक पल को हम खुश क्या हुए,
मानो रूठ गए गम से,
मनाकर फिर ले आए हमें,
बोले- हम तन्हा क्यों रहें,
चन्द बातें कर लें तुमसे।
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डॉ.संध्या राज मेहता
मीरारोड

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