मामाश्री कांतिलालजी भंडारी को भावपूर्ण श्रद्धांजली संग सादर समर्पित
सहज संपन्न,सरस गायक,
सौम्य स्वभाव, मधुर-भाषी,
सरल व्यक्तितव् के धनी,
सरस मुस्काते मेरे कांति मामा थे वो।
सबको प्यारे सबके लाडले,
माँ के चहेते भ्राता थे वो।
बचपन से देखा , उनकी प्यारी स्मित को ,
वो फुग्गे पाड़कर बाल बनाने की रीत को।
जग में अनूठा मामासा का व्यवहार था ,
मेघनगर आते ही नागदा आना हर बार था।
नौकरी के लिए बाहर जाना उनको मंजूर था ,
पर परिवार से दिल का नाता नहीं दूर था।
कोई महीना खाली नहीं जाता ,
जब कोई उनका पत्र नहीं पाता।
उनके सुन्दर अक्षरों वाला पत्र पढ़ने सब उत्सुक रहते,
पत्रलेखन की अनोखी कला से सबको गदगद करते ।
केवल हॉल चाल नहीं, पूरे माह के कार्यों का ब्यौरा होता ,
म्होटी बेन को सब हॉल बताने को उनका मन बावरा रहता।
मेघनगर या नागदा मिलने का मौका ढूँढ़ते
मिलने पर देर रात तक गपशप के माहौल चलते।
जाते वक्त नाजुक ,भावुक मन , मन ही मन रोता ,
दूर रहने का गम ,सदा आँखों से कहता।
पर मामीसा के साथ -सहकार से तसल्ली पाते ,
सही मायने में मानो प्रेम के प्रेम में गोते लगाते।
शहर शहर घूम, दोहद मुकाम पाना ,
बिटिया के प्यार सानिध्य संग पुनः रतलाम घर बसाना।
दूर दृष्टा थे , मन मोहना थे वो ,
जीवन जीने की कला के ज्ञानी थे वो।
मामीसा की धर्म आराधना के अनुमोदक थे ,
तपस्या में सहयोग कर अनुमोदना तप आराधक थे।
याद आती है वो गर्मियों की छुट्टियाँ
पुअर दो माह मेघनगर में बिताना।
फिर राखी पर जाना, पर्युषण करके आना ,
खुशनसीबी हमारी,इतने मामा मासियों का प्यार पाना।
अब कहाँ नसीब , वो गर्मियों में मामा घर जाना।
अस्वस्थ होने पर भी बहन को मिलने ,
तबियत पूछने ,दौड़ दौड़ कर जाना ,
भाई बहनों के प्रति प्रेम की गंगा बहाना,
प्रेम की कांति का प्रकाश फैलाना ,
यही था कांति के प्रेम का फ़साना।
भानजी -डॉ.संध्या 'राज' मेहता
मीरा रोड
सहज संपन्न,सरस गायक,
सौम्य स्वभाव, मधुर-भाषी,
सरल व्यक्तितव् के धनी,
सरस मुस्काते मेरे कांति मामा थे वो।
सबको प्यारे सबके लाडले,
माँ के चहेते भ्राता थे वो।
बचपन से देखा , उनकी प्यारी स्मित को ,
वो फुग्गे पाड़कर बाल बनाने की रीत को।
जग में अनूठा मामासा का व्यवहार था ,
मेघनगर आते ही नागदा आना हर बार था।
नौकरी के लिए बाहर जाना उनको मंजूर था ,
पर परिवार से दिल का नाता नहीं दूर था।
कोई महीना खाली नहीं जाता ,
जब कोई उनका पत्र नहीं पाता।
उनके सुन्दर अक्षरों वाला पत्र पढ़ने सब उत्सुक रहते,
पत्रलेखन की अनोखी कला से सबको गदगद करते ।
केवल हॉल चाल नहीं, पूरे माह के कार्यों का ब्यौरा होता ,
म्होटी बेन को सब हॉल बताने को उनका मन बावरा रहता।
मेघनगर या नागदा मिलने का मौका ढूँढ़ते
मिलने पर देर रात तक गपशप के माहौल चलते।
जाते वक्त नाजुक ,भावुक मन , मन ही मन रोता ,
दूर रहने का गम ,सदा आँखों से कहता।
पर मामीसा के साथ -सहकार से तसल्ली पाते ,
सही मायने में मानो प्रेम के प्रेम में गोते लगाते।
शहर शहर घूम, दोहद मुकाम पाना ,
बिटिया के प्यार सानिध्य संग पुनः रतलाम घर बसाना।
दूर दृष्टा थे , मन मोहना थे वो ,
जीवन जीने की कला के ज्ञानी थे वो।
मामीसा की धर्म आराधना के अनुमोदक थे ,
तपस्या में सहयोग कर अनुमोदना तप आराधक थे।
याद आती है वो गर्मियों की छुट्टियाँ
पुअर दो माह मेघनगर में बिताना।
फिर राखी पर जाना, पर्युषण करके आना ,
खुशनसीबी हमारी,इतने मामा मासियों का प्यार पाना।
अब कहाँ नसीब , वो गर्मियों में मामा घर जाना।
अस्वस्थ होने पर भी बहन को मिलने ,
तबियत पूछने ,दौड़ दौड़ कर जाना ,
भाई बहनों के प्रति प्रेम की गंगा बहाना,
प्रेम की कांति का प्रकाश फैलाना ,
यही था कांति के प्रेम का फ़साना।
भानजी -डॉ.संध्या 'राज' मेहता
मीरा रोड
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